भगवानपुरा (निमाड़) |(संभाग पोस्ट) आधुनिकता की चकाचौंध के बीच निमाड़ अंचल ने आज भी अपनी जड़ों को मजबूती से थामे रखा है। शीतला सप्तमी के पावन अवसर पर ग्राम धूलकोट में आदिवासी भिलाला समाज द्वारा पारंपरिक ‘गुड़ का ख्याल’ (गुड़ तोड़) कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए जिले भर से हजारों की संख्या में श्रद्धालु और ग्रामीण बाजार चौक पहुंचे।
परंपरा और रोमांच का संगम
यह आयोजन केवल एक खेल नहीं, बल्कि गहरी आस्था का प्रतीक है। निमाड़ की यह विशेषता है कि यहाँ रीति-रिवाज पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत हैं।
1). आयोजन चक्र: यह परंपरा बारी-बारी से निभाई जाती है। एक वर्ष ग्राम भग्यापुर और मोहना में गुड़ तोड़ा जाता है, तो अगले वर्ष धूलकोट में इसका आयोजन होता है।
2). प्रक्रिया: सबसे पहले बाजार चौक में विधि-विधान से भूमि पूजन किया गया। इसके बाद 12 फीट ऊंचा खंभा गाड़ा गया, जिसके शीर्ष पर लाल कपड़े में गुड़ और चने की पोटली बांधी गई।
सोटियों के प्रहार और युवाओं का जोश
कार्यक्रम का सबसे रोमांचक हिस्सा वह रहा जब युवाओं की टोली इस पोटली को उतारने के लिए आगे बढ़ी। परंपरा के अनुसार:
1). युवाओं को खंभे पर चढ़कर पोटली उतारनी होती है।
2). नीचे मौजूद लोग सोटियों (लाठियों) से उन पर प्रहार करते हैं।
3). युवाओं को इन प्रहारों से बचते हुए लक्ष्य तक पहुंचना होता है।
4). पोटली को कुल सात बार खंभे पर चढ़ाया और उतारा जाता है।
“यह परंपरा लगभग 150 वर्षों से चली आ रही है। हमारे पूर्वजों ने इसे शुरू किया था और आज की युवा पीढ़ी भी उसी उत्साह के साथ इसमें भाग लेती है।”— विजय सिंह सोलंकी, पटेल (ग्राम धूलकोट)
उत्सवमयी माहौल
दोपहर से शुरू हुआ यह कार्यक्रम देर शाम तक चला। आदिवासी समाज के लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे नजर आए। ढोल-मांदल की थाप पर थिरकते ग्रामीण और लोकगीतों की गूंज ने पूरे धूलकोट को उत्सव के रंग में सराबोर कर दिया।
समाज के बुजुर्गों का कहना है कि इस तरह के आयोजनों से न केवल आपसी भाईचारा बढ़ता है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति को समझने का मौका भी मिलता है।

