नविन गलकर (Sambhagpost News)
इंदौर| लोकतंत्र में पारदर्शिता के लिए बना सूचना का अधिकार अब सरकारी दफ्तरों में धूल फांक रहा है। ताज़ा और शर्मनाक मामला कलेक्टर कार्यालय इंदौर से सामने आया है, जहाँ एक आवेदक को जानकारी देने के बजाय उसे दफ्तरों के अंतहीन चक्कर लगवाने और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का खेल खेला जा रहा है। विडंबना देखिए कि जिस कार्यालय को पूरे जिले में कानून का पालन सुनिश्चित करना है, वही कानून की धज्जियां उड़ाने का केंद्र बन गया है।
आवेदक ने नियम से आवेदन किया, फीस भरी, दस्तावेज लगाए। जवाब में क्या मिला? एक फोन कॉल—
“अरे भाई साहब, ये कागज चाहिए दफ्तर आना पड़ेगा, जरा फलां मैडम से मिल लीजिए, फिर ढिकां सर से बात कर लीजिएगा।”
वाह! क्या गजब की व्यवस्था है। शायद यहाँ के ‘बाबू’ आवेदक को दफ्तर बुलाकर ‘शिष्टाचार’ सिखाना चाहते हैं। आखिर ये कौन सी ‘खास मैडम’ हैं जिनसे मिले बिना फाइल का पहिया नहीं घूमता? क्या सूचना का अधिकार अब सरकारी दफ्तरों में ‘दर्शन शास्त्र’ बन गया है कि जब तक बाबू के दर्शन न हों, ज्ञान (जानकारी) प्राप्त नहीं होगी ?
📌 वरिष्ठ अधिकारियों के आदेश भी बेअसर
इस तमाशे में जब संभाग आयुक्त कार्यालय ने कलेक्टर कार्यालय को पत्र लिखकर ‘आवश्यक कार्यवाही’ का निर्देश दिया। साधारण भाषा में कहें तो बड़े साहब ने छोटे साहब को काम करने को कहा।
लेकिन कलेक्टर कार्यालय के शूरवीरों ने उस आदेश को भी ठेंगे पर रख दिया। जब ये लोग अपने ही वरिष्ठ अधिकारियों के पत्रों को कचरे के डिब्बे की शोभा बना सकते हैं, तो आम आदमी की हैसियत तो इनके लिए ‘चींटी’ से ज्यादा कुछ नहीं है।
संभाग आयुक्त कार्यालय के निर्देशों को भी कलेक्टर कार्यालय के बाबुओं और अफसरों ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया। न तो कोई कार्यवाही हुई और न ही आवेदक को सूचित करने की जहमत उठाई गई। यह सीधे तौर पर वरिष्ठ कार्यालय के आदेशों की अवमानना और प्रशासनिक अनुशासनहीनता का जीवंत प्रमाण है।
❓ सवाल जो सिस्टम से जवाब मांगते हैं
आवेदक को व्यक्तिगत रूप से बुलाकर मानसिक प्रताड़ना क्यों दी जा रही है?
क्या यह जानकारी छिपाने या आवेदक को डराने की कोई सोची-समझी चाल है?
⚠️ यह सिर्फ इंदौर की कहानी नहीं
यह सिर्फ एक जिले की बीमारी नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश के सरकारी महकमों में यह ‘कैंसर’ की तरह फैल चुका है। जानकारी मत दो, और अगर देना भी पड़ जाय तो अधूरी और भ्रामक दो, उसे इतना थका दो कि वह जानकारी मांगना ही भूल जाए।
अधिकांश कार्यालयों में आर.टी.आई. के नियमों का ऐसा ‘मजाक’ उड़ाया जा रहा है कि कपिल शर्मा का शो भी फीका पड़ जाए। तीस दिन की समय सीमा अब महज कागजों तक सीमित है।
प्रथम अपील और द्वितीय अपील के बाद भी जानकारी न मिलना यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, जिसे छिपाने के लिए आर.टी.आई. कानून का ही गला घोंटा जा रहा है।

