“मनीष महाजन और जितेंद्र मेड़ा का निलंबन तो सिर्फ ट्रेलर है, पूरी फिल्म अभी बाकी है। ‘संभाग पोस्ट’ जल्द करेगा बड़े स्तर पर खुलासा।”
खरगोन। नगर पालिका परिषद खरगोन में भ्रष्टाचार की जड़ें अब इतनी गहरी हो चुकी हैं कि अधिकारियों को न तो नियम-कायदों का डर है और न ही जनता की भावनाओं का सम्मान। जननायक टंट्या मामा की मूर्ति स्थापना मामले में हुई घोर लापरवाही ने प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है।
मनीष महाजन और जितेंद्र मेड़ा का निलंबन इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि जब शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई नहीं होती, तो भ्रष्टाचारियों के हौसले किस कदर बुलंद हो जाते हैं। हालांकि, जानकारों का मानना है कि यह निलंबन महज एक ‘ट्रेलर’ है, भ्रष्टाचार की असली ‘फिल्म’ तो उन फाइलों में दफन है जिन्हें जांच के नाम पर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
शिकायतों का ‘कब्रिस्तान’ बनी नगर पालिका
नगर पालिका के खिलाफ भ्रष्टाचार की यह कोई पहली शिकायत नहीं है। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने निर्माण कार्यों में गुणवत्ता की कमी और बजट की बंदरबांट को लेकर दर्जनों शिकायतें कीं।
- खुद ही चोर, खुद ही सिपाही: विडंबना देखिए कि इंदौर से लेकर भोपाल तक बैठे वरिष्ठ अधिकारियों ने जांच की कमान उन्हीं लोगों को सौंप दी जिनके खिलाफ शिकायतें थीं।
- मौन समर्थन: पूर्व में हुई कई जांचें महज खानापूर्ति बनकर रह गईं। शासन-प्रशासन की चुप्पी ने इन भ्रष्टाचारियों को अभयदान देने का काम किया, जिससे शहर की व्यवस्था खोखली होती चली गई।
मूर्ती विवाद और आंदोलन का संदिग्ध ‘यू-टर्न’
शहर के गलियारों में इस वक्त सबसे बड़ी चर्चा टंट्या मामा मूर्ति मामले में हुए ‘यू-टर्न’ की है। जयस संगठन द्वारा ठेकेदार के खिलाफ एफआईआर की मांग को लेकर किया गया धरना अचानक शांत हो गया, जो मामले को संदिग्ध बनाता है।
“क्या रसूखदारों को बचाने की हो रही है कोशिश?” स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि पूरे प्रकरण में नगर पालिका अध्यक्ष छाया जोशी के पुत्र दक्ष जोशी का नाम सामने आने के बाद, मामले को रफा-दफा करने की कवायद शुरू हो गई। आरोप है कि यह ‘समझौता’ अध्यक्ष के इशारे पर हुआ है। हालांकि, यह अभी जनचर्चा का विषय है, लेकिन इसने प्रशासन की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
14% कमीशन का ‘दीमक’ और प्रशासनिक पंगुता
भ्रष्टाचार अब केवल लापरवाही तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ‘मुखिया’ स्तर से शुरू होकर नीचे तक कमीशनखोरी के रूप में फैल चुका है।
- संभाग पोस्ट का दावा: हम पहले भी नगर पालिका में चल रहे 14% कमीशन के खेल का पर्दाफाश कर चुके हैं।
- नमक हलाली नहीं, नमक हरामी: जनता की गाढ़ी कमाई से तनख्वाह लेने वाले अधिकारी और कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। जब अच्छे कार्य का श्रेय अधिकारियों की लॉबी लेती है, तो भ्रष्टाचार के पाप में उनकी हिस्सेदारी तय क्यों नहीं की जाती?
‘संभाग पोस्ट’ की प्रशासन को खुली चेतावनी
संभाग पोस्ट प्रशासन को आगाह करता है कि यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो भ्रष्टाचार का यह “असुर” खरगोन के विकास को निगल जाएगा।
प्रशाशन को चाहिए की :
- पुरानी फाइलों की फिर से जांच: पिछले वर्षों में ठंडे बस्ते में डाली गई शिकायतों की फाइलें दोबारा खोली जाएं।
- निष्पक्ष जांच दल: जांच टीमों में नगर पालिका के अधिकारियों की जगह बाहरी और निष्पक्ष अधिकारियों को शामिल किया जाए।
- टेक्निकल ऑडिट: पिछले 2-3 वर्षों में हुए सभी निर्माण कार्यों का तकनीकी और वित्तीय ऑडिट अनिवार्य हो।
आने वाले समय में ‘संभाग पोस्ट’ बड़े स्तर पर खुलासा करने जा रहा है, जिसमें कई रसूखदार नामों से पर्दा उठेगा। यदि अब भी सुधार नहीं हुआ, तो जनता का विश्वास सरकारी तंत्र से पूरी तरह उठ जाएगा और उन्हें न्याय के लिए सड़कों पर उतरना पड़ेगा।
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